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अगर मैं होती परिंदा (स्वरचित कविता )
by Rohita Soni | October 30, 2015

अगर मैं होती परिंदा
दूर गगन में उड़ जाती
पेड़ों पहाड़ों घाटियों में
इठलाती और बल खाती |

हँसती मैं हवाओं के संग
घूमती मैं घटाओं के संग
अगर मैं होती परिंदा
बादलों के उस पार
चाँद कि नगरी में जाती,
देखती उन अप्सराओं को
जो है मन को लुभाती |

अगर मैं होती परिंदा
दूर गगन में उड़ जाती |